सदगुरू संत शिरोमणि गुरू संत कबीर
सदगुरू संत शिरोमणि गुरू कबीर का जन्म उस समय हुआ जब भारतीय समाज मे छूआ .छूत उच् नीच जाति - ' पाति . गरीबी बेरोजगारी पाखंड अंध्विश्वास पंडे पुजारियो का बोलबाला था ं भारतीय समाज उस समय अंध्कार मे था शोषित बर्ग का सदियो से शाेष्ण हाे रहा था ा शोषितो की कोई आवाज सुनने वाला नही था उस समय संत कबीर ने भारतीय जनमानस मे फैली बुराइयो को जड से समाप्त करने का बीडा उठाया सद्गुरु कबीर एक उच्च कोटी के महान समाज सुधारक संत थे जिन्होने इस भारतीय समाज मे फैली कुरुतीयो को समाप्त करने का कार्य किया ा हजारो बर्षो से चली आ रही विष्मताबादी ब्यवस्था मे जो शोषित समाज के लोग पीस रहे थे उन्हे जगाने का कार्य किया ा सदगुरू कबीर ने कहा ृ
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा.
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
अर्थ : सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए. तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का.

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