करूणा के सागर तथागत के विचार
क्रोध और शत्रुता
करूण के सागर तथागत गौतम बुद्ध का जन्म् छठी शताब्दी मे उस समय हुआ जब भारतीय समाज मे मानव मानव मे उच नीच का भेद भाव पाखड बाहयआडम्बर पंडे पुजारियो का बोनबाला ा था तथा समाज बर्णव्यवस्था के अनुसार चलता था ाक्रोध और शत्रुता
गैतम ने कहा क्रोध मत करो शत्रुता को भूल जावो अपने शत्रुओ को मैत्री से जीतो
यही बौद्ध जीवन मार्ग है वैर से वैर कभी शात नही होता प्रेमसे ही वैर शांत होता है
जो यही सोचता है उसने मुझे गाली दी उसने मेरे साथ छल दुर्व्यहार किया उसने मुझे हरा दिया उसने लूट लिया उसका वैर कभी शांत नही होता जो ऐसे विचार नही रखता उसी का वैर शांत होता है ा

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