कबीर के राम
बेद बैदिक साहित्य सूत्रग्रंथ एवं छह शास्त्रो मे कही ईश्वर व परमात्मा के अर्थ मे राम शब्द का प्रयोग नही हुआ है ा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी मे जब संक्षिप्त महाकाब्य पौलस्य बध अर्थात बालमीकी रामायण बालकाण्ड लीखा गया जिसका नाम बाद मे बालमीकी रामायण हुआ ा उसमे श्रीराम की कथा नर कथा के रूप मे चित्रित की गयी ा करीब ईसा के डेढ़ दो सौ पूर्व तक उसमे श्रीराम आदि चारो भाईयो को विष्णु का अंशावतार होना का प्रक्षेप हुआ ा ईसा के बारह सौ बर्ष बाद अन्य रामायणो मे श्रीराम को ईश्वर सिद्ध करने का प्रयास किया गया ा पहली बार आध्यात्म रामायण मे राम को परमब्रम्ह एवं जगत नियंता माना गया
कबीर साहेब तक राम नाम परमात्मा बाचक हो गया इसलिए कबीर साहेब ने राम नाम के शब्द को स्वीकार कर उसे अपना विवेकपूर्ण अर्थ दिया
कबीर साहेब ने कहां राम अपना स्वरूप ही है यह चेतन जीव ही तो राम है उनका राम अविनाशी चेतन है जो सबके ह्रदय मे निवास करता है वे अविनाशी जीव को ही राम मानते है उस पर विचार करने का राय देते है ा सदगुरू कबीर ने बीजक मे आत्मतत्व के लिए जीव शब्द का प्रयोग किया है कबीर साहेब ने दशरथ पुत्र राम को अपना भगवान या इश्वर कभी नही माना सदगुरू कबीर कबीर कहते है .हुदय बसे तंही राम न जाना ा मोको कहा ढुढत बंदे मै तो तेरे पास ा राम बढा की राम जानां ा दर की बात कहो दरवेशा वादशाह है कौने वेषा ा राम नाम जाने बीना भौ बुडी मुआ संसार ा
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